कटघरे में गांधी
कटघरे में गांधी — एक भूल, एक विचारधारा और एक दल का क्षरण
धर्मेंद्र सिंह की कलम से
इतिहास किसी को अमर नहीं बनाता, वह सबको कठघरे में खड़ा करता है। फर्क सिर्फ इतना होता है कि कुछ लोग अपने जीते-जी कठघरे में खड़े होते हैं, और कुछ मरने के सौ साल बाद। एक नाम मोहनदास करमचंद गांधी दूसरी श्रेणी में हैं। जिन गांधी को राष्ट्रपिता कहा गया, ंजिनकी तस्वीर नोट पर छपी, जिनके नाम सड़क, योजना, विश्वविद्यालयों पर लिखा गया, वही गांधी आज सोशल मीडिया की अदालत में रोज पेश हो रहे हैं। इल्जाम है — एक भूल ?और दावा है — उसी एक भूल ने गांधीवाद को अप्रासंगिक किया और कांग्रेस को रसातल में पहुंचा दिया। क्या यह सच है? या समय खुद अपना हिसाब बराबर कर रहा है? आइए, बिना बिंदुओं के, बिना नारों के, सिर्फ सिलसिलेवार घटनाओं और उनके असर को समझते हैं, क्योंकि बहस अब भावना से नहीं, तथ्य और परिणाम से हो रही है। आज सौ साल बाद भी सवाल वही है?
तेईस दिसंबर उन्नीस सौ छब्बीस की सुबह दिल्ली के एक घर में गोलियां चलीं। स्वामी श्रद्धानंद, आर्य समाज के संन्यासी, शुद्धि आंदोलन के नायक, अपने बिस्तर पर मृत पड़े थे। मारने वाला अब्दुल रशीद था, जिसने अदालत में कहा कि वह कातिल नहीं, गाज़ी है। जुर्म साबित हुआ, फांसी हुई, फाइल बंद। पर फाइल बंद होने से पहले महात्मा गांधी ने ‘यंग इंडिया’ में लिखा — रशीद पथभ्रष्ट है, पर मेरा भाई है। मुझे उससे नफरत नहीं। यह वाक्य उस दौर में बम की तरह फटा। आर्य समाज, हिंदू महासभा, और आम गृहस्थ, जिसने अपने नायक को खोया था, सबके लिए यह नमक था। गांधी का तर्क था कि नफरत से नफरत बढ़ेगी, और देश टूटेगा। पर पीड़ित पक्ष का तर्क था कि जब जख्म हरा हो तो मरहम पहले चाहिए, दर्शन बाद में। यहीं गांधी पहली बार जनता की अदालत में खड़े हुए। आरोप था — संवेदना की प्राथमिकता गलत तय की। हत्यारे के ‘मानव’ को पीड़ित के ‘बलिदान’ से ऊपर रखा।
इसी तरह का दूसरा मुकदमा तेईस मार्च उन्नीस सौ इकतीस को लगा। लाहौर सेंट्रल जेल में भगत सिंह, राजगुरु, सुखदेव फांसी चढ़े। देश ने गांधी की ओर देखा। गांधी ने इरविन से कहा जरूर, पर समझौता नहीं तोड़ा। उनका अहिंसा का व्रत अपनी जगह अटल रहा। पर नौजवानों के मन में सवाल बैठ गया — जब अपने बच्चों पर बात आए तो ‘रणनीति’, जब दूसरों के बच्चों पर आए तो ‘सिद्धांत’? यह सवाल सौ साल में खत्म नहीं हुआ, बल्कि हर चुनाव में, हर आंदोलन में, हर शहीद दिवस पर लौटकर आता है।
गांधीवाद के तीन खंभे बताए जाते हैं — सत्य, अहिंसा, सर्वधर्म समभाव। तीनों ही खंभे उन्नीस सौ बीस से उन्नीस सौ सैंतालीस तक अंग्रेजी हुकूमत से लड़ने के लिए कारगर थे। क्योंकि दुश्मन साझा था, और दुश्मन के पास बंदूक थी। गांधी ने देश को लाठी के बदले चरखा पकड़ाया और कहा कि यह बंदूक से ज्यादा ताकतवर है। देश ने माना, क्योंकि सामने गोरा था। पर आजादी के बाद दुश्मन बदला। अब दुश्मन गरीबी थी, भ्रष्टाचार था, जाति थी, तुष्टिकरण था, वंशवाद था। इन दुश्मनों के सामने चरखा नहीं चलता, नीति चाहिए, डंडा चाहिए, और सबसे बढ़कर ‘भेद’ करने का साहस चाहिए। गांधीवाद ‘भेद’ करता ही नहीं था। वह हत्यारे को भी भाई कहता था। नतीजा यह हुआ कि आजादी के बाद जब राज्य को अपराधी और निर्दोष में, मेहनती और मुफ्तखोर में, राष्ट्रवादी और विघटनकारी में फर्क करना था, तब गांधीवादी सत्ता ‘सबको साथ लेकर’ चलने की जिद में फर्क करना भूल गई।
कांग्रेस इसी गांधीवाद की राजनीतिक उत्तराधिकारी थी। उसने आजादी के बाद तीन दशक तक एकछत्र राज किया, क्योंकि गांधी की नैतिक पूंजी उसके पास थी। पर पूंजी खर्च होती है, कमाई नहीं हो तो खत्म हो जाती है। कांग्रेस ने कमाई नहीं की। उसने गांधी के ‘सर्वधर्म समभाव’ को ‘सिलेक्टिव धर्म समभाव’ बना दिया। शाहबानो केस में संसद से सुप्रीम कोर्ट का फैसला पलट दिया गया, क्योंकि एक समुदाय नाराज हो सकता था। कश्मीर में धारा तीन सौ सत्तर को दशकों तक छेड़ा नहीं गया, क्योंकि ‘भावना’ आहत हो सकती थी। राम मंदिर पर ताला लगा रहा, क्योंकि ‘तनाव’ हो सकता था। हर बार तर्क वही था जो गांधी ने उन्नीस सौ छब्बीस में दिया था — नफरत बढ़ेगी, देश टूटेगा। पर देश टूटने के डर से जोड़ने का काम भी नहीं हुआ। नतीजा यह हुआ कि बहुसंख्यक समाज को लगने लगा कि उसके जख्म पर मरहम रखने वाला कोई नहीं। उसके स्वामी श्रद्धानंद मरते रहे, और सत्ता ‘भाईचारे’ का पाठ पढ़ाती रही।
यही वह ‘एक भूल’ है जिसकी बात आज हर गली में होती है। भूल यह नहीं कि गांधी ने रशीद को भाई कहा। भूल यह है कि उसके बाद के सौ साल तक कांग्रेस ने हर रशीद को ‘भटका हुआ’ और हर श्रद्धानंद को ‘आंकड़ा’ बना दिया। पीड़ित की जाति देखकर संवेदना तय होने लगी। कैराना से हिंदू पलायन करे तो ‘लॉ एंड ऑर्डर’, बंगाल में रामनवमी पर पत्थर चले तो ‘उकसावा’। पर पहलू खान से लेकर तबरेज अंसारी तक हर नाम याद रखा गया, हर मोमबत्ती जली। यह असंतुलन जनता को दिखता है। जनता आंकड़े नहीं पढ़ती, वह चेहरा पढ़ती है। और जब उसे लगता है कि राज्य का चेहरा उसके आंसू नहीं पोंछता, तो वह चेहरा बदल देती है।
दो हजार चौदह में चेहरा बदला। नरेंद्र मोदी आए और उन्होंने वही किया जो कांग्रेस नहीं कर पाई — ‘भेद’ किया। उन्होंने कहा कि तुष्टिकरण नहीं, सबका विकास। उन्होंने तीन तलाक खत्म किया, धारा तीन सौ सत्तर हटाई, राम मंदिर बनवाया। हर कदम पर विपक्ष ने वही पुराना गांधीवादी तर्क दिया — देश टूट जाएगा, नफरत बढ़ेगी। पर देश टूटा नहीं। नफरत की दुकानें जरूर बंद हुईं। क्योंकि जब राज्य ‘न्याय’ को ‘वोट’ से ऊपर रखता है, तो कौम देखना बंद कर देता है। कांग्रेस यह नहीं कर पाई। वह गांधी के ‘भाई’ वाले बयान को नीति बना बैठी, और भूल गई कि गांधी ने रशीद को फांसी से नहीं बचाया था। कानून ने अपना काम किया था। कांग्रेस ने कानून को ही ‘संवेदना’ के नाम पर लचीला कर दिया।
आज स्थिति यह है कि गांधीवाद किताबों में है, सड़क पर नहीं। कांग्रेस का वोट प्रतिशत बीस से नीचे है, और जहां सत्ता है वहां क्षेत्रीय दलों की बैसाखी पर। युवा पीढ़ी भगत सिंह की तस्वीर लगाती है, गांधी की नहीं। क्योंकि उसे लगता है कि भगत सिंह ने ‘कीमत चुकाई’, गांधी ने ‘समझौता’ किया। यह धारणा पूरी तरह सच नहीं है, पर धारणा ही लोकतंत्र में सच बन जाती है। और धारणा बनती है लगातार मिलने वाले संदेश से। कांग्रेस का संदेश पिछले तीन दशक से यही था — हम बहुसंख्यक की बात करेंगे तो अल्पसंख्यक डर जाएगा। इसलिए बहुसंख्यक के मुद्दे पर चुप रहो। इस चुप्पी को जनता ने ‘तिरस्कार’ पढ़ा।
गांधी को कटघरे में खड़ा करना आसान है, क्योंकि वह जवाब देने नहीं आएंगे। पर सवाल गांधी से नहीं, उनके वारिसों से है। गांधी ने उन्नीस सौ छब्बीस में जो कहा, वह उन्नीस सौ छब्बीस के भारत के लिए था। तब देश गुलाम था, और गुलाम देश में एकता सबसे बड़ी जरूरत थी। दो हजार छब्बीस का भारत आजाद है, परमाणु शक्ति है, दुनिया की तीसरी अर्थव्यवस्था बनने जा रहा है। यहां अब एकता की कीमत पर न्याय नहीं खरीदा जा सकता। यहां अब ‘भाई’ कहने से पहले ‘अपराधी’ कहना पड़ेगा। यहां अब ‘समभाव’ का मतलब ‘समान कानून’ है, ‘विशेषाधिकार’ नहीं।
कांग्रेस अगर जिंदा रहना चाहती है तो उसे गांधी की लाठी छोड़नी होगी और सरदार पटेल की हिम्मत उठानी होगी। पटेल भी गांधीवादी थे, पर वे सोमनाथ बनवाने गए, हैदराबाद में पुलिस एक्शन किया, जूनागढ़ को भारत में मिलाया। उन्होंने ‘भाईचारा’ निभाया, पर ‘राष्ट्र’ पहले रखा। कांग्रेस ने नेहरू वाला गांधीवाद चुना, पटेल वाला नहीं। नेहरू वाला गांधीवाद विचार में ऊंचा था, जमीन पर फिसल गया। पटेल वाला गांधीवाद जमीन पर चलता था, इसलिए सरदार आज भी स्टैच्यू ऑफ यूनिटी बनकर खड़े हैं, और नेहरू-गांधी के नाम पर योजनाओं के नाम बदल रहे हैं।
क्या एक भूल से विचारधारा खत्म होती है? हां, अगर वह भूल सुधारने की जिद न हो। इस्लामिक दुनिया में ‘तौबा’ का सिद्धांत है — गलती मानो, प्रायश्चित करो, आगे बढ़ो। कांग्रेस ने गलती मानी ही नहीं। वह आज भी शाहबानो को सही ठहराती है, आज भी कश्मीर पर जनमत की बात करती है, आज भी राम मंदिर की तारीख पूछती है। जब तक पार्टी यह कहती रहेगी कि ‘हमने कुछ गलत नहीं किया’, तब तक जनता कहती रहेगी कि ‘तुम्हारा वक्त खत्म हो गया’।
समय क्रूर जज है। वह भाषण नहीं सुनता, परिणाम देखता है। गांधी ने कहा था कि मेरे मरने के बाद लोग मुझे लाठी से पीटेंगे। आज पीट रहे हैं। पर पीट इसलिए रहे हैं कि उनके नाम पर सत्ता ने जनता को पीटा। गांधी की अहिंसा को कायरता बना दिया गया। गांधी के समभाव को तुष्टिकरण बना दिया गया। गांधी के सत्य को ‘परिवार’ बना दिया गया। इसमें गांधी की गलती कम है, गद्दी पर बैठे लोगों की ज्यादा। पर इतिहास में बिल वंशज चुकाते हैं। कांग्रेस आज वही बिल चुका रही है।
क्या गांधीवाद मर गया? नहीं। गांधीवाद तब तक जिंदा रहेगा जब तक कोई कमजोर के साथ खड़ा होगा। पर वह गांधीवाद सड़क पर होगा, संसद में नहीं। क्योंकि संसद में अब नया ‘वाद’ आ गया है — जिसे लोग ‘राष्ट्रवाद’ कहते हैं। यह राष्ट्रवाद भगत सिंह की फांसी को याद रखता है, स्वामी श्रद्धानंद की गोली को याद रखता है, और कहता है कि अब ‘भाई’ कहने से पहले ‘नागरिक’ कहो। कानून सबसे ऊपर, भावना बाद में।
अंत में, कठघरा खाली नहीं रहता। गांधी कल वहां थे, नेहरू परसों, आज कांग्रेस है, कल कोई और होगा। लोकतंत्र का यही नियम है — जो जनता का दर्द नहीं सुनेगा, जनता उसे सुना देगी। गांधी ने एक बार दर्द सुना और ‘भाई’ कहा। कांग्रेस ने सौ बार दर्द अनसुना किया और ‘वोट बैंक’ कहा। बस, इतनी सी भूल थी। पर इतिहास में छोटी भूलें ही बड़े विस्फोट करती हैं। गांधीवाद और कांग्रेस का विस्फोट हो चुका है। मलबा हटेगा, नया मकान बनेगा। नाम गांधी का रहेगा या नहीं, यह वक्त बताएगा। पर मकान का नक्शा अब ‘समान नागरिक संहिता’ से बनेगा, ‘सर्वधर्म समभाव’ से नहीं। यही समय का जवाब है।





