ओडिशा में महिला हॉकी के विकास की कहानी बांस की छड़ी से अंतरराष्ट्रीय मंच तक
राष्ट्रीय खेल दिवस के अवसर पर, ओडिशा में महिला हॉकी के विकास की कहानी बांस की छड़ी से अंतरराष्ट्रीय मंच तक पहुंची बेटियां
सतीश शर्मा (उप संपादक)
राउरकेला, 29अगस्त 2026: नीदरलैंड और बेल्जियम में आयोजित पुरुष एवं महिला हॉकी विश्व कप में भारतीय महिला टीम ने शानदार प्रदर्शन करते हुए पांचवां स्थान हासिल किया। इस टीम में ओडिशा की युवा प्रतिभा सुनेलिता टोप्पो भी शामिल थीं। सुनेलिता की मौजूदगी केवल एक खिलाड़ी की उपलब्धि नहीं, बल्कि ओडिशा में महिला हॉकी की चार दशक से कम पुरानी लेकिन गौरवशाली यात्रा का प्रतीक है। यह सर्वविदित है कि सुंदरगढ़ जिले के आदिवासी समाज में हॉकी पीढ़ियों से चली आ रही परंपरा रही है। हालांकि, लंबे समय तक यह परंपरा मुख्य रूप से पुरुषों तक ही सीमित थी। गांवों में लड़के हॉकी खेलते थे, लेकिन लड़कियों के हाथों में हॉकी स्टिक दिखाई देना लगभग असंभव था।
ओडिशा में महिला हॉकी के इतिहास की शुरुआत 17 जुलाई 1988 को हुई। यह वह ऐतिहासिक दिन था, जब पानपोष हॉकी छात्रावास के दरवाजे पहली बार लड़कियों के लिए खोले गए। इससे पहले 1985 में शुरू हुए इस छात्रावास में केवल लड़कों को ही प्रशिक्षण दिया जाता था। जब लड़कियों का चयन शुरू हुआ, तब प्रशिक्षकों ने हॉकी कौशल के बजाय मुख्य रूप से उनकी फिटनेस को आधार बनाया। इसका एक बड़ा कारण यह था कि छात्रावास में आने से पहले अधिकांश लड़कियों ने हॉकी स्टिक तक नहीं छुई थी। लेकिन छात्रावास पहुंचने के बाद इन बेटियों ने अपनी मेहनत और जज्बे से साबित कर दिया कि वे किसी से कम नहीं हैं। उनका संदेश साफ था—“हम किसी से कम नहीं।”
राष्ट्रीय स्तर पर पहला कदम
ओडिशा की महिला हॉकी टीम ने पहली बार 1992 में किसी राष्ट्रीय प्रतियोगिता में हिस्सा लिया। रांची में आयोजित 28वीं जूनियर राष्ट्रीय हॉकी चैंपियनशिप से ओडिशा की महिला हॉकी की राष्ट्रीय यात्रा शुरू हुई। कोच पी. मधुकरन के नेतृत्व में गई उस टीम में ग्लोरिया डुंगडुंग, ज्योति सुनीता कुल्लू, टेरेसा कुजूर, सविता एक्का और लोतेम डुंगडुंग जैसी प्रतिभाशाली खिलाड़ी शामिल थीं। राष्ट्रीय स्तर पर पदार्पण के महज एक वर्ष के भीतर पानपोष हॉकी छात्रावास ने भारतीय महिला हॉकी को अपना पहला अंतरराष्ट्रीय खिलाड़ी दिया। 1993 में ग्लोरिया डुंगडुंग ने भारतीय टीम की जर्सी पहनकर इतिहास रचा। उल्लेखनीय बात यह है कि पानपोष छात्रावास ने लड़कों से पहले भारत को महिला अंतरराष्ट्रीय खिलाड़ी दिया।
पहली ट्राफी और विदेश यात्रा
1995 में जालंधर में आयोजित जूनियर राष्ट्रीय चैंपियनशिप में ओडिशा की महिला टीम ने पहली बार खिताब जीतकर अपनी क्षमता का परिचय दिया। इसी वर्ष ओडिशा की तीन खिलाड़ियों—ज्योति सुनीता कुल्लू, टेरेसा कुजूर और सविता एक्का—का चयन दक्षिण कोरिया में आयोजित एएचएफ क्लब चैंपियनशिप में भाग लेने वाली भारतीय टीम के लिए हुआ। यह ओडिशा की महिला हॉकी खिलाड़ियों की पहली विदेश यात्रा थी। इसके दो वर्ष बाद 1997 में ओडिशा की महिला हॉकी के इतिहास में एक और स्वर्णिम अध्याय जुड़ा। बेंगलुरु में आयोजित राष्ट्रीय खेलों के फाइनल में ओडिशा ने बिनिता टोप्पो के निर्णायक गोल की बदौलत चंडीगढ़ को 1-0 से हराकर स्वर्ण पदक जीता। इसके बाद ओडिशा की टीम ने 1999 में मुंबई, 2000 में चेन्नई और 2003 में पुणे में आयोजित राष्ट्रीय प्रतियोगिताओं में भी स्वर्ण पदक जीतकर अपनी श्रेष्ठता साबित की। 2002 में छत्तीसगढ़ के कोरबा में ओडिशा की महिला टीम ने पहली बार सब-जूनियर राष्ट्रीय ट्रॉफी जीतकर जमीनी स्तर पर महिला हॉकी की मजबूत होती नींव का संकेत दिया।
ज्योति सुनिता कुल्लू का गौरवशाली इतिहास
ओडिशा की महिला हॉकी के सफर में 2006 का वर्ष भी विशेष महत्व रखता है। दोहा एशियाई खेलों के उद्घाटन समारोह में मार्चपास्ट के दौरान ओडिशा की महिला हॉकी खिलाड़ी ज्योति सुनीता कुल्लू को भारतीय दल का ध्वजवाहक बनने का दुर्लभ सम्मान मिला। यह ओडिशा की महिला हॉकी के लिए गौरव का क्षण था। 1993 में ग्लोरिया डुंगडुंग के भारतीय टीम में प्रवेश के बाद ओडिशा की अनेक महिला खिलाड़ियों के लिए राष्ट्रीय टीम के दरवाजे खुलते चले गए। इन खिलाड़ियों ने न केवल भारतीय हॉकी को मजबूत किया, बल्कि ओडिशा का नाम भी देश-विदेश में रोशन किया। इनमें ज्योति सुनीता कुल्लू (अर्जुन पुरस्कार विजेता), बिनिता टोप्पो, सुभद्रा प्रधान, एग्नेशिया लुगुन, बिनिता खेस, नीलिमा कुजूर, अन्नारिता केरकेट्टा, अनुपा बारला, सुनीता लाकड़ा, दीप ग्रेस एक्का (अर्जुन पुरस्कार विजेता), लिलिमा मिंज और नमिता टोप्पो जैसी खिलाड़ियों का योगदान उल्लेखनीय है।
प्रशिक्षको का योगदान भी अहम
खिलाड़ियों की सफलता के पीछे प्रशिक्षकों और सहयोगी स्टाफ की भूमिका को भी नजरअंदाज नहीं किया जा सकता। महिला हॉकी को मजबूत आधार देने में सिल्वेस्टर टोप्पो, अमूल्य नंद बिहारी, कालू चरण चौधरी, पी के षाड़ंगी, विजय लकड़ा, तेज कुमार खेस, मिल्टन डुंगडुंग, अमूल्य बेहरा, लुसेला एक्का और फ्लोरेंसिया एक्का जैसे प्रशिक्षकों का योगदान महत्वपूर्ण रहा है। इन प्रशिक्षकों ने सीमित संसाधनों के दौर में प्रतिभाओं को तलाशा, उन्हें तराशा और राष्ट्रीय तथा अंतरराष्ट्रीय स्तर तक पहुंचने का रास्ता दिखाया।
अब नई पीढ़ी की बारी
आज ओडिशा की महिला हॉकी एक लंबा सफर तय कर चुकी है। कभी जहां लड़कियों के हाथ में हॉकी स्टिक देखना दुर्लभ था, वहीं आज ओडिशा की बेटियां भारतीय टीम की जर्सी पहनकर विश्व के बड़े हॉकी मैदानों पर अपना कौशल दिखा रही हैं। पिछले कुछ दशकों में महिला हॉकी का विस्तार संख्या और सुविधाओं—दोनों दृष्टियों से हुआ है। प्रशिक्षण केंद्रों, छात्रावासों और खेल सुविधाओं के विस्तार ने नई प्रतिभाओं के लिए अवसर बढ़ाए हैं। सुनेलिता टोप्पो जैसी नई पीढ़ी की खिलाड़ी इस समृद्ध विरासत को आगे बढ़ा रही हैं। अब जिम्मेदारी इन युवा खिलाड़ियों के कंधों पर है कि वे ओडिशा की महिला हॉकी की गौरवशाली परंपरा को और ऊंचाइयों तक ले जाएं। उम्मीद है कि आने वाले वर्षों में भारतीय महिला हॉकी टीम में ओडिशा की बेटियों की संख्या और बढ़ेगी और वे अंतरराष्ट्रीय मंच पर देश के साथ-साथ अपने राज्य का नाम भी रोशन करेंगी। राष्ट्रीय खेल दिवस के अवसर पर यही हमारी शुभकामना है—ओडिशा की महिला हॉकी का सफर स्वर्णिम भविष्य की ओर लगातार आगे बढ़ता रहे।





