एससी एसटी कानून पर धर्मेन्द्र सिंह का विश्लेषण
धर्मेन्द्र सिंह का विश्लेषण
"SC/ST कानून - सामाजिक न्याय बनाम सामाजिक द्वंद्व का 35 साल का सफर", वीपी सिंह से मोदी सरकार तक एक ही चौराहे पर खड़ी राजनीति,
1989-90 में पूर्व प्रधानमंत्री विश्वनाथ प्रताप सिंह ने मंडल कमीशन और SC/ST अत्याचार निवारण अधिनियम को लागू कर सामाजिक न्याय का जो रास्ता खोला था, उसकी कीमत उन्होंने 11 महीने में अपनी सरकार गंवाकर चुकाई। तब नारा था - "राजा नहीं फकीर है, भारत की तकदीर है" और कुछ ही महीनों में वही "राजा नहीं रंक है, देश का कलंक है" में बदल गया। आज 2026 में मौजूदा केंद्र सरकार उसी चौराहे पर खड़ी दिखती है, जहां एक तरफ दलित-पिछड़े वोट बैंक की सियासत है और दूसरी तरफ सवर्ण समाज का बढ़ता आक्रोश, जो सोशल मीडिया पर भाजपा के परंपरागत डिफेंडर रहे वर्ग में साफ दिख रहा है।
आंकड़े क्या कहते हैं? - NCRB की तस्वीर
NCRB के आंकड़ों को दो नजरिए से देखना होगा:
1. केसों की बाढ़: 2018 में जहाँ SC के 47 हजार केस थे, 2023-24 में यह 57,000 से ऊपर पहुँच गया। 2024 में अकेले SC के 55,698 और ST के 9,062 केस दर्ज हुए। इसमें यूपी सबसे ऊपर - 14,642 केस, फिर MP - 7,765, बिहार - 7,549
2. सजा का सच: 2020 में सजा दर 39-40% थी, जो 2022-23 में गिरकर 32-33% पर आ गई। 2024 में राष्ट्रीय औसत 33.9% SC और 33.2% ST रहा। यानी 10 में से लगभग 7 मामले में बरी या साक्ष्य के अभाव में खत्म।
3. पुलिस क्लोजर: पुलिस जांच में हर साल 14-15% मामले "असत्य, तथ्य की भूल, या अपर्याप्त साक्ष्य" में बंद होते हैं। 2016 में 5,347 मामले पुलिस ने ही "झूठे" पाए थे। राजस्थान पुलिस ने 2020 में 40% से ज्यादा मामलों को फर्जी बताया था।
यह आंकड़ा बताता है कि कानून सुरक्षा कवच भी है और कुछ जगहों पर निजी रंजिश, जमीन विवाद या मुआवजे के लिए हथियार भी बना है। केंद्र सरकार ने 2016 में नियम बदलकर FIR पर ही 25-50% मुआवजा (1 लाख से 8.25 लाख तक) तुरंत देने का प्रावधान किया था, जिससे दुरुपयोग की शिकायतें बढ़ीं।
सवर्ण समाज की नाराजगी क्यों?
भाजपा का कोर वोटर मानता था कि सरकार दहेज कानून 498A और SC/ST कानून के दुरुपयोग पर रोक लगाएगी। 2018 में सुप्रीम कोर्ट ने गिरफ्तारी से पहले जांच की शर्त लगाई थी, पर केंद्र ने अध्यादेश लाकर उसे पलट दिया। उसके बाद से सवर्ण समाज में संदेश गया कि "वोट हमारा, डर हमारा।"
UGC के नए इक्विटी रूल्स 2026 ने आग में घी डाला। इसमें जातिगत भेदभाव की शिकायत पर सवर्ण छात्र-शिक्षक पर तुरंत कार्रवाई का प्रावधान है। इसके विरोध में सवर्ण संगठनों के प्रदर्शन के बाद शिक्षा मंत्री धर्मेंद्र प्रधान को मंत्रिमंडल से हटना पड़ा, जिसने सरकार को बैकफुट पर धकेल दिया।
सोशल मीडिया ट्रेंड इसका सबूत है - जो वर्ग 2019-2024 तक मोदी के एक आह्वान पर थाली बजाता था, वही जन्मदिन पर दिया जलाने से परहेज कर रहा है। नाराजगी सड़कों पर नहीं, व्हाट्सएप ग्रुप और वोट की खामोशी में है।
वीपी सिंह परिवार का प्रतीकात्मक केस
इस पूरे बहस को प्रतीकात्मक बनाने वाली घटना हाल में आई जब वीपी सिंह के अपने परिवार पर ही SC/ST एक्ट में केस दर्ज हुआ। जिस परिवार ने सामाजिक न्याय के लिए सत्ता कुर्बान की, उसी कानून के दायरे में आ गया - यह बताता है कि कानून कितना व्यापक और कितना विवादास्पद हो चुका है
आखिर रास्ता क्या?
सामाजिक न्याय गैर-समझौतावादी होना चाहिए, पर न्याय एकतरफा नहीं हो सकता। सुप्रीम कोर्ट के पूर्व CJI बीआर गवई ने भी कहा है कि कानून में सुरक्षा उपाय (सेफगार्ड) जोड़े जाने की जरूरत है।
समाधान तीन स्तरीय होना चाहिए:
1. FIR के साथ मुआवजे की जगह जांच और चार्जशीट के बाद मुआवजा
2. झूठे मुकदमे में सख्त दंड का प्रावधान, जैसा SC/ST एक्ट में ही धारा 4 में है
3. फास्ट ट्रैक कोर्ट से 60 दिन में जांच और 6 महीने में ट्रायल पूरा हो, ताकि न पीड़ित को इंतजार करना पड़े, न निर्दोष को जेल जाना पड़े।
वरना 1990 की तरह फिर सामाजिक न्याय और सामाजिक द्वंद्व एक दूसरे को काटेंगे, और फायदा तीसरी ताकतों को मिलेगा और देश में जातिगत भेद बढ़ेगा।जिसे काफ़ी कम किया जा चुका है।





