आसान नही होता है साहब सिपाही या सैनिक बनना
नितिन सिन्हा (संपादक - खबरसार)
यदि आप में इतनी खूबियां नही हो कि आप अपने आप से लड़ते हुए भी,अनेको विपरीत परिस्थितियो का सामना कर सकते हो,तो ही कभी आप सिपाही बनने का निर्णय लीजियेगा----

-वैसे आज की परिस्थितियों में सिपाही बनने के अपने खुद के लिए फैसले पर सैनिक/सिपाही को कई बार पछतावा भी होता है,,,क्योंकि उसकी निस्वार्थ सेवा का प्रतिफल,उसे आत्मसम्मान को ताक में रखकर मिलता है..जिनके लिए वो अपनी जान और परिवार की चिंता छोड़ कर सेवा करता है,अक्सर वे ही लोग उसके अस्त्तित्व को बिगाड़ने पर तुले होते है जिनके लिए वो उनके इशारों पर अनवरत चलने वाला संवेदन शून्य मशीनी मानव ही नजर आता है,जिसकी अपनी कोई भावना या जरूरत नही होती है.तमाम चुनोतियो के साथ जीने के बावजूद ना तो उसे जीवित रहते,ना ही उसके मरने के बाद ही उसे उचित सम्मान मिलता है.उसके अपने ही लोग उसके अमानवीय शोषण में कोई कोर कसर नही छोड़ते है,यदि कभी कोई उसकी दयनीय हालत पर तरश भी खा जाए और उसके प्रति थोड़ी बहुत सहानुभूति दिखाये तो उसे यह समझाइस दी जाती है कि अरे छोडो ना आप,वह एक मामूली सिपाही ही तो है....

सच कहें तो उसे देश सेवा के नाम पर चौ-तरफा लड़ाई लड़नी होती है,पहली लड़ाई देश और समाज के अंदर-बाहर मौजूद दुश्मनों से लड़नी होती है.जिनसे लड़ कर यदि वो बचा रहा तो फिर उसे अपने आत्मसम्मान और अकेलेपन से लड़ना होता है,इसे आप खुद से खुद की कठिन लड़ाई कह सकते है.जिसमे कई बार उसकी हार भी होती है.तीसरी बड़ी लड़ाई उसे उसके प्रति गैर जिम्मेदार रहने वाली व्यवस्था से लड़नी होती है.तो उसकी चौथी और अंतिम लड़ाई हर तरह की प्राकृतिक आपदाओं से भी होती है.जिनका सामना कर जीवित रहने की क्षमता एक आम इंसान के लिए बूते से बाहर की बात होती है.बात यही खत्म नहीं होती इन हालातों से लड़ते हुए यदि कोई जवान शारीरिक अक्षम या दिव्यांग हो गया तो उसे जीवन पर्यंत खुद से संघर्ष रत रहना पड़ता है।।
जरा सोचियेगा इन हालातो से लड़कर बचा रहने वाला कोई भी इंसान भला साधारण आदमी कैसे हो सकता है ?--फिर उसे एक मामूली सा सिपाही कह कर उसे अपमानित/शोषित करना क्या सही होगा..?





